Monday, 15 May 2017

भारत में तलाक- डॉ. रामवृक्ष सिंह का आलेख



भारत में तलाक
डॉ. रामवृक्ष सिंह
आजकल तीन तलाक पर बड़ी पुरज़ोर बहस चल रही है। आम धारणा यह है कि मुस्लिम समाज में महिलाओं पर बड़े जुल्म होते हैं और सबसे बड़ा जुल्म होता है तीन तलाक के ज़रिए। मामला भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सामने है। ऐसे में आज के टाइम्स ऑफ इंडिया ने सन् 2011 की जनगणना के हवाले से भारत के सभी धर्मावलंबियों में पति-पत्नी के पार्थक्य और तलाक, दोनों की बड़ी बेबाक स्थिति प्रस्तुत की है, जो इस आलेख के अंत में तालिकाबद्ध रूप में प्रस्तुत है। (बहुत संभव है, फेसबुक की सीमाओं के चलते उक्त तालिका विरूपित हो जाए)।
टाइम्स का कथन है कि तीन तलाक की विभीषिका से तत्संबंधी समाज की महिलाओं को मुक्ति मिलनी चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं; किन्तु यह देख लेना भी उचित रहेगा कि भारत के अन्य धर्मावलंबियों में विवाहित दंपतियों के अलग होने और तलाक की वास्तविक स्थिति क्या है। जहाँ तक तलाक की बात है, वह हिन्दुओं, जैनियों और सिक्खों के मुकाबले मुसलमानों में दुगनी, और इसाइयों के लगभग बराबर, किन्तु बौद्धों से कम है।
लेकिन यदि विवाहित जोड़ों के अलग-अलग रहने की स्थिति देखें, यानी ऐसी स्थिति जब वे कानूनन तलाक नहीं लेते, किन्तु साथ रहते भी नहीं, बल्कि अलग-अलग रहते हैं, तो बौद्धों और इसाइयों का अनुपात बाकी की तुलना में कहीं अधिक हो जाता है। प्रति एक हजार 16.6 ईसाई और 17.6 बौद्ध व्यक्ति तलाक लेकर अथवा अन्य रूप में अलग-अलग रहते हैं। इसके बनिस्बत मुसलमानों में यह अनुपात 11.6 और हिन्दुओं में उससे थोड़ा ही कम यानी 9.1 प्रति हजार का है। सबसे कम अनुपात सिक्खों और जैनियों का है, यानी केवल 6.3 प्रति हजार।
टाइम्स का मत है कि हिन्दुओं में तलाक की दर केव 2.2 प्रति हजार है, क्योंकि वे कानूनी पचड़ों में न पड़कर आपसी रजामंदी से अलग हो जाने को अधिक तरज़ीह देते हैं। हिन्दुओं में यह सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य भी है। इसके बरअक्स मुसलमानों में विधिवत तलाक की दर 4.9 प्रति हजार है, क्योंकि वे विधिवत (शरीया के अनुसार) तलाक को ज्यादा तवज्जो देते हैं।
कतिपय धर्मों/संप्रदायों में तलाक या पार्थक्य की दर इसलिए कम है क्योंकि वहाँ शिक्षा और समृद्धि अपेक्षाकृत अधिक है और समुदाय के सदस्यों की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के कारण दंपतियों पर समुदाय का दबाव अधिक रहता है।
आम धारणा है कि मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति के अधिकार बहुत सीमित हैं और वहाँ तलाक बहुत सरलता से और एकतरफा तरीके से दिया जा सकता है, तथा तलाक के बाद महिलाओं को कई प्रकार की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं से गुजरना पड़ता है। साथ ही, आधुनिक शिक्षा, आर्थिक संपन्नता की भी बहुत कमी है। इस सब के चलते हमारे देश में मुस्लिम महिला का अपने शौहर से तलाक होना खासी मुसीबत का सबब बन जाता है। बहुत आसानी से तलाक के प्रचलन का सबसे बड़ा दुष्परिणाम देश की वे गरीब कमसिन लड़कियाँ झेलती हैं, जिन्हें अरब देशों से तफरीह और मौज-मस्ती के लिए भारत आए अधेड़ अमीर-उमराव कुछ दिनों के लिए निकाह करके अपनी बेगम बनाते हैं और फिर हस्बे-मामूल मेहर की रकम अदा करके, यहीं तलाक देकर अपने देश रवाना हो जाते हैं। मीडिया में ऐसे कई मामले उजागर हुए हैं।
2001 और 2011 की जनगणना में तलाक और पार्थक्य की स्थिति का संप्रदाय-वार तुलनात्मक विवरण भी टाइम्स ने दिया है, जो उक्त तालिका के कॉलम 5 में द्रष्टव्य है। इससे स्पष्ट है कि उक्त अवधि में सिक्खों में तलाक/अलगाव के मामले लगभग 108% बढ़ गये। इसके बाद सर्वाधिक वृद्धि जैनियों में (50%) हुई। मुस्लिमों में यह वृद्धि केवल 39% रही, जबकि हिन्दुओं में उनसे थोड़ी सी अधिक, यानी 40%।
टाइम्स का कथन है कि सभी धर्मों और संप्रदायों की उन महिलाओं के लिए बेहतर कानूनों की ज़रूरत है, जिन्हें पति द्वारा छोड़ दिए जाने, अलग होने अथवा तलाक दिए जाने के बाद कोई निर्वाह-राशि नहीं मिलती। विवाह के बाद परित्यक्त अथवा तलाकशुदा हिन्दू महिलाओं की संख्या मुसलमान महिलाओं से पाँच गुना अधिक है।  और ऐसा इसलिए, क्योंकि देश में हिन्दुओं की कुल आबादी भी मुसलमान आबादी की लगभग पाँच गुना है।
इसे कहते हैं, बद से बदनाम बुरा।
तालिका
दंपतियों के अलग होने और तलाक की दर (प्रति 1000 शादियों पर)
धर्म/संप्रदाय
अलग होने की दर
तलाक की दर
योग
2001 से 2011 के बीच वृद्धि (%)
(1)
(2)
(3)
(4) (2+3)
(5)
हिन्दू
6.9
2.2
9.1
40
मुसलमान
6.7
4.9
11.6
39
इसाई
11.9
4.7
16.6
46
सिक्ख
4.1
2.2
6.3
108
बौद्ध
12.0
5.6
17.6
34
जैन
3.6
2.7
6.3
50
(स्रोत- 2001 और 2011 की जनगणना)

मैं यानी भौकाल- डॉ. रामवृक्ष सिंह



व्यंग्य
मैं यानी भौकाल
डॉ. रामवृक्ष सिंह
अपने यहाँ ब्रह्म की परिकल्पना अजर, अजन्मे, अमर, अनूप, अदृश्य सत्ता के रूप में की गई है। ब्रह्म की कारयित्री शक्ति है माया, जिसके सहयोग से ब्रह्म पूरी दुनिया का सृजन करता है और जिसके दम पर दुनिया के सारे कार्य-व्यापार संचालित होते हैं। हमने माया को नया, बिलकुल आधुनिक नाम दिया है और वह है भौकाल। व्यक्ति की वास्तविक सत्ता तो ब्रह्म के अंश वाली है। लेकिन वह दिखाई पड़ता है अपने भौकाल के कारण। भौकाल नहीं तो कुछ नहीं। कम से कम समझता तो वह यही है कि भौकाल है तो मैं हूँ।
यही कारण है कि जिससे मिलिए वह सबसे पहले अपना भौकाल आगे बढ़ा देता है कि लो पहले मेरे भौकाल से मिल लो और उसके बाद भी जिन्दा बच गये तो मुझसे मिलना। मैं इंजीनियर अमुक, मैं डॉक्टर तमुक, मैं विधायक का नाती, मैं सांसद का भतीजा, मैं मुख्यमंत्री का पीए, मैं डीएम का चपरासी। तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के भौकाल। गोया भौकाल बिना किसी का कोई परिचय ही नहीं। प्रथम परिचय में ही लोग अपना भौकाल सामने खड़ा कर देते हैं। अब यह आप पर निर्भर है कि आप उस भौकाल से प्यार करें, उससे डरें या नफ़रत करें। बहरहाल, यह तो कोई उन्हीं से पूछे कि महोदय आपके इस भौकाल का मैं क्या करूँ?
अमूमन भौकाल का एक ही आशय होता है- सामने वाले को डराना। कुदरत ने इसी उद्देश्य से विभिन्न जीवों को विभिन्न प्रकार के भौकाल दिए हैं, जैसे सांपों को फन दिया, हाथी को भारी-भरकम शरीर, भैंस को सींग और शेर, कुत्ते आदि को नुकीले भयानक दाँत। आदमी को भगवान ने तिकड़मी बुद्धि दी, कि जा, तुझे जैसे मन करे वैसे भौकाल बनाना।
यही कारण है कि हर आदमी अपने-अपने तरीके से अपना भौकाल बनाता है। किसी के पास बड़ी डिग्री होती है तो किसी के पास बड़ा नाम। कोई सदियों पुरानी अपनी जाति का ही भौकाल बनाता है और किसी का भौकाल उसके संपर्क होते हैं। किसी का भौकाल उसकी नौकरी है, तो किसी का पैसा। दुनिया में बहुत कम लोग हैं जिनके पास भौकाल नहीं है। जिन्दगी भर आदमी भौकाल ही सहेजता रह जाता है। सच कहें तो भौकाल के बिना समाज के किसी प्रतिष्ठित आदमी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जिसके पास ऊँचा सरकारी पद है, वह अपनी कार की नंबर प्लेट और मकान के पत्थर पर तुरन्त छपवा लेता है- डीएम, विधायक, मंत्री, प्रधान, सचिव, प्रिंसिपल आदि-आदि। यह भौकाल वर्तमान कालिक ही हो ऐसा नहीं है। भौकाल माने सार्वकालिक। एक बार भौकाल बनने के बाद वह आजीवन रहता है। भौकाल न रहे, पर उसकी हनक रह जाती है। कई बार आदमी भौकाल के बिलकुल नजदीक पहुंचते-पहुंचते रह जाता है। ज़रा-सा चूक जाता है। लेकिन उस चूक को भी अपने तईं वह भौकाल ही गिनता है और उसकी घोषणा भी किसी न किसी रूप में करता रहता है। ऐसे लोगों के मकान पर लगी तख्ती पर लिखा मिलता है- पूर्व प्रत्याशी- सभासद, पूर्व प्रत्याशी-विधान सभा, पूर्व प्रधान-पति, पूर्व सरपंच आदि।
दुनिया का बहुत-सा कारोबार भौकाल-आधारित है। बड़ी कार, बड़ा बंगला, बड़ी हवेली, बड़ा गेट, बडी मूँछें, बड़ी तोंद, बड़ी बारात, बड़ा तोरण, बड़ा तम्बू, बड़ा बैण्ड, बड़ा धमाका, बड़ा लाव-लश्कर...। यानी बहुत-सी बड़ी चीज़ों की ख्वाहिश केवल इसलिए होती है कि वे बड़ा भौकाल बनाती हैं। इस लिहाज़ से आगरे का ताजमहल भी हमें एक भौकाल ही लगता है, वर्ना क्या तो शाहजहाँ और क्या मुमताज। ऐसे अरबों जोड़े दुनिया में हुए हैं। लेकिन मुमताज को लगा कि मेरा शौहर मेरी मोहब्बत की यादगार में कोई भौकाल क्यों न बनवाए! बस उसने फरमाइश कर दी कि मैं जब मर जाऊँ तो मेरी कब्र पर एक भौकाल खड़ा करना, जो तुम्हारी और मेरी मुहब्बत की याद दिलाए। उसी खानदान के आखिरी चिराग़ थे बहादुरशाह ज़फर। उनका भौकाल तो बहुत बड़ा था, लेकिन औकात कुछ भी नहीं। अंग्रेजों ने पकड़कर रंगून भेज दिया तो बादशाह ने लिखा- दो गज़ जमीन भी न मिली कू-ए यार में। पता नहीं, बादशाह को अपने भौकाल की असलियत समझ आयी या नहीं। पर हमें तो आती है। इसलिए हम हमेशा ज़मीन पर रहते हैं। न भौकाल बनाते हैं, न किसी के भौकाल से डरते हैं।
हमें जब अपने ज्येष्ठ पुत्र के लिए वधू की तलाश थी तो एक सज्जन ने हमसे अपनी भतीजी के लिए संपर्क किया। बातचीत के दूसरे ही वाक्य में उन्होंने बताया कि हमारे भैया, यानी जिन सज्जन की बेटी के लिए बात हो रही है, वे सत्तासीन पार्टी के जिला स्तर के पदाधिकारी हैं और दो-चार दिनों में अपने दल-बल के साथ आपके निवास पर आकर आपको धन्य करेंगे। उन्होंने अपनी ओर से भौकाल बनाकर हमें प्रभावित करना चाहा। लेकिन हम तो डर गये। और डर की नींव पर कोई रिश्ता कैसे बनेगा? लिहाज़ा हमने हाथ जोड़ लिए कि महोदय हमें किसी राजनेता के घर से बहू नहीं लानी।
सड़क पर चलते हुए जिन गाड़ियों पर पद-सूचक, कार्यालय-सूचक या व्यवसाय-सूचक इबारत लिखी होती है, उसका क्या प्रयोजन है? क्या यह सब लिखने से गाड़ियों के इंजन अधिक माइलेज देते हैं या उनकी रफ्तार बढ़ जाती है? कुछ समय पहले तक देश की बहुत-सी गाड़ियों पर अलग-अलग रंगों की बत्तियाँ लगी होती थीं। उसका क्या प्रयोजन था? प्रयोजन साफ था- भौकाल। और भौकाल इसलिए नहीं कि आओ हमारी इज्जत करो, हमें आदर दो, हमसे श्रद्धा करो। प्रयोजन था आम आदमी को डराना कि हटो सामने से, नहीं तो अभी कुचल देंगे। कवितावली में कलि-काल का वर्णन करते हुए बाबा तुलसीदास ने लिखा था कि कलियुग में हर कोई खुद को दूसरे से बड़ा समझेगा और सामने होने पर आँखें तरेरते हुए, डाँटकर पूछेगा- हम तुम लगि कछु घाटि! क्या मैं तुझसे कमतर हूँ? ना जी ना, आप कमतर कहाँ हैं! आप तो बहुत बड़े भौकाल हैं!
कई बार मन होता है कि विभिन्न प्रकार के कार्यालयों के नाम लिखी गाड़ी में बैठे लोगों से पूछें कि महोदय क्या इस गाड़ी में वह कार्यालय चलता है, जिसका नाम आपने गाड़ी पर लिखवाया है? और यदि नहीं चलता है राह चलते आम आदमी को इससे क्या फर्क पड़ता है कि उसके आगे, अगल-बगल या पीछे चल रही गाड़ी किस कार्यालय के किस अधिकारी या चपरासी की है?
हम देश के कई शहरों में घूमे हैं। वहाँ बहुत-से राजाओं, महाराजाओं के बनाए हुए भौकाल हैं। भौकाल के किसी कोने में कुछ कमरों में राजा-महाराजा रहते हैं। शेष हिस्से की नुमाइश लगा दी गई है। टिकट खरीदो- भौकाल देखो। उस टिकट के पैसे से राज-महाराजा अपने भौकाल का रख-रखाव करते हैं। हो सकता है, उसी से उनकी दाल-रोटी भी चलती हो।
एक दिन सारा का सारा भौकाल धरा रह जाता है। ब्रह्म का अंश धीरे से निकल लेता है। दो गज की काया जलकर खाक हो जाती है या कफन-दफन के साथ मिट्टी में मिल जाती है। पानी के बुलबुले-सा इस जीव का अस्तित्व। किन्तु महा ठगिनी माया के कुप्रभाववश यह छोटी-सी बात हम समझ नहीं पाते और खुद को समझ बैठते हैं- भौकाल।  मैं यानी भौकाल!

Thursday, 26 November 2015

बराबर, एक समान और उचित



बराबर, एक समान और उचित
हिन्दी में 'बराबर' शब्द का अर्थ है 'एक समान'। इसलिए जब हम कहते हैं कि पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होतीं तो सीधा-सा अर्थ यह होता है कि हर उंगली (या अंगुली) का आकार-प्रकार और प्रकृति अलग-अलग होती है। कहावत का अभिप्राय यह है कि सब लोग एक जैसे नहीं होते, यानी सबमें पारस्परिक भिन्नता होती है। बराबर शब्द बर और अबर यानी वर और अवर से बना प्रतीत होती है। जब हम इस शब्द का विग्रह करते हैं तो इसका पूरा अर्थ उद्घाटित होता है। वर यानी श्रेष्ठ और अवर यानी अश्रेष्ठ। जब कोई श्रेष्ठ अथवा अश्रेष्ठ न हो, यानी जब अच्छे और बुरे का, छोटे और बड़े का, कम और बेशी का भेद समाप्त हो जाए तब जो स्थिति निर्मित होती है, उसे कहते हैं बराबर। इस दृष्टि से बराबर या बराबरी का भाव बड़ी ही लोकतांत्रिक, या यों कहें कि साम्यवादी भाव प्रतीत होता है।
इस दृष्टि से 'बराबर' शब्द में कोई अर्थ-चमत्कार नहीं है। किन्तु मराठी और गुजराती के 'बरोबर' में इस शब्द का अर्थगत चमत्कार साफ दिखाई देता है। वहाँ 'बरोबर' हिन्दी के बराबर का ही परिवर्तित रूप है, किन्तु उसका अर्थ 'एक समान' न होकर उचित' और 'न्याय-संगत' है। इस दृष्टि से 'बराबर' का अर्थ हुआ, जो बिलकुल न्यायोचित हो, जिसमें किसी के साथ कोई भेद-भाव न करते हुए, तार्किक और न्यायौचित्य की दृष्टि से बिलकुल सही बात कही गई हो। गुजराती लोग प्रायः कहते हैं- बरोबर कथ्यू, यानी बिलकुल सही कहा। यदि वे पूछना चाहते हैं कि ठीक है न या उचित है न तो वे कहते हैं- बरोबर छे न। मराठी-भाषी भी बरोबर शब्द का उपयोग इसी अर्थ में करते हैं।
हिन्दी में बर का अर्थ है तगड़ा या मज़बूत। कई बार गरिष्ठ भोजन के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है। जब कोई भोज्य पदार्थ इतना सुस्वादु, तैलीय और गरिष्ठ हो कि उसके दो-चार निवाले खाने के बाद ही मन भर  जाए तो कहते हैं कि अमुक-अमुक भोज्य-पदार्थ बहुत जब्बर बना है। बहुत तगड़े बकरे, बैल आदि को भी जब्बर विशेषण दिया जाता है। शायद यह शब्द हिन्दी में संस्कृत के वर से आया होगा, जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ। हिन्दी प्रान्तों में कहावत मशहूर है- जबरा मारे और रोने भी न दे। यानी तगड़ा आदमी अपने से दुर्बल को सताता भी है और फरियाद भी नहीं करने देता। जबरा या जब्बर शब्द बर (वर) का ही विस्तार है। अर्थ दोनों का एक ही है- सशक्त, बलवान, सामर्थ्यवान आदि। इसका विपरीतार्थी शब्द है अब्बर (अवर), यानी जो दुर्बल हो, कमज़ोर हो, क्षीण-शक्ति हो। अब्बर आदमी को अकसर जब्बर आदमी दबा लेता है, उसका हक मार लेता है, उसका स्वत्व छीन लेता है।
जब अब्बर यानी पीड़ित पक्ष न्यायालय के समक्ष पहुँचता है और जब्बर से अपनी रक्षा की गुहार लगाता है तो न्यायालय क्या करता है? वह पूरे मामले को तर्क की कसौटी पर कसता है। न्याय की देवी के हाथ में तराजू है। उसमें दोनों पक्षों के तर्क, न्याय की रौशनी में तौले जाते हैं। फिर न्याय की मूर्ति फैसला सुनाती है। यह फैसला न बर के पक्ष में होता है न अब्बर के पक्ष में। फैसला होता है 'बराबर' यानी बर (जब्बर) और अब्बर, दोनों के लिए न्यायोचित। इस 'बराबर' यानी न्यायोचित फैसले के बारे में कोई यह नहीं कह सकता कि फैसला अनुचित रहा।


बराबर, एक समान और उचित
हिन्दी में 'बराबर' शब्द का अर्थ है 'एक समान'। इसलिए जब हम कहते हैं कि पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होतीं तो सीधा-सा अर्थ यह होता है कि हर उंगली (या अंगुली) का आकार-प्रकार और प्रकृति अलग-अलग होती है। कहावत का अभिप्राय यह है कि सब लोग एक जैसे नहीं होते, यानी सबमें पारस्परिक भिन्नता होती है। बराबर शब्द बर और अबर यानी वर और अवर से बना प्रतीत होती है। जब हम इस शब्द का विग्रह करते हैं तो इसका पूरा अर्थ उद्घाटित होता है। वर यानी श्रेष्ठ और अवर यानी अश्रेष्ठ। जब कोई श्रेष्ठ अथवा अश्रेष्ठ न हो, यानी जब अच्छे और बुरे का, छोटे और बड़े का, कम और बेशी का भेद समाप्त हो जाए तब जो स्थिति निर्मित होती है, उसे कहते हैं बराबर। इस दृष्टि से बराबर या बराबरी का भाव बड़ी ही लोकतांत्रिक, या यों कहें कि साम्यवादी भाव प्रतीत होता है।
इस दृष्टि से 'बराबर' शब्द में कोई अर्थ-चमत्कार नहीं है। किन्तु मराठी और गुजराती के 'बरोबर' में इस शब्द का अर्थगत चमत्कार साफ दिखाई देता है। वहाँ 'बरोबर' हिन्दी के बराबर का ही परिवर्तित रूप है, किन्तु उसका अर्थ 'एक समान' न होकर उचित' और 'न्याय-संगत' है। इस दृष्टि से 'बराबर' का अर्थ हुआ, जो बिलकुल न्यायोचित हो, जिसमें किसी के साथ कोई भेद-भाव न करते हुए, तार्किक और न्यायौचित्य की दृष्टि से बिलकुल सही बात कही गई हो। गुजराती लोग प्रायः कहते हैं- बरोबर कथ्यू, यानी बिलकुल सही कहा। यदि वे पूछना चाहते हैं कि ठीक है न या उचित है न तो वे कहते हैं- बरोबर छे न। मराठी-भाषी भी बरोबर शब्द का उपयोग इसी अर्थ में करते हैं।
हिन्दी में बर का अर्थ है तगड़ा या मज़बूत। कई बार गरिष्ठ भोजन के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है। जब कोई भोज्य पदार्थ इतना सुस्वादु, तैलीय और गरिष्ठ हो कि उसके दो-चार निवाले खाने के बाद ही मन भर  जाए तो कहते हैं कि अमुक-अमुक भोज्य-पदार्थ बहुत जब्बर बना है। बहुत तगड़े बकरे, बैल आदि को भी जब्बर विशेषण दिया जाता है। शायद यह शब्द हिन्दी में संस्कृत के वर से आया होगा, जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ। हिन्दी प्रान्तों में कहावत मशहूर है- जबरा मारे और रोने भी न दे। यानी तगड़ा आदमी अपने से दुर्बल को सताता भी है और फरियाद भी नहीं करने देता। जबरा या जब्बर शब्द बर (वर) का ही विस्तार है। अर्थ दोनों का एक ही है- सशक्त, बलवान, सामर्थ्यवान आदि। इसका विपरीतार्थी शब्द है अब्बर (अवर), यानी जो दुर्बल हो, कमज़ोर हो, क्षीण-शक्ति हो। अब्बर आदमी को अकसर जब्बर आदमी दबा लेता है, उसका हक मार लेता है, उसका स्वत्व छीन लेता है।
जब अब्बर यानी पीड़ित पक्ष न्यायालय के समक्ष पहुँचता है और जब्बर से अपनी रक्षा की गुहार लगाता है तो न्यायालय क्या करता है? वह पूरे मामले को तर्क की कसौटी पर कसता है। न्याय की देवी के हाथ में तराजू है। उसमें दोनों पक्षों के तर्क, न्याय की रौशनी में तौले जाते हैं। फिर न्याय की मूर्ति फैसला सुनाती है। यह फैसला न बर के पक्ष में होता है न अब्बर के पक्ष में। फैसला होता है 'बराबर' यानी बर (जब्बर) और अब्बर, दोनों के लिए न्यायोचित। इस 'बराबर' यानी न्यायोचित फैसले के बारे में कोई यह नहीं कह सकता कि फैसला अनुचित रहा।